Shahjahan History In Hindi | शाहजहाँ का इतिहास

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शाहजहाँ का इतिहास Shahjahan History In Hindi 

शाहजहाँ का इतिहास पूरा नाम – शाहबउद्दीन मुहम्मद शाहजहाँ (ख़ुर्रम)
जन्म – 5 जनवरी, सन् 1592, लाहौर
पिता – जहाँगीर
माता – जगत गोसाई (जोधाबाई)
विवाह – आरज़ुमन्द बानो बेगम उर्फ मुमताज महल इनके साथ विवाह और भी कन्दाहरी बेग़म अकबराबादी महल, हसीना बेगम, मुति बेगम, कुदसियाँ बेगम, फतेहपुरी महल, सरहिंदी बेगम, श्रीमती मनभाविथी इनके साथ।
शाहजहाँ का इतिहास / Shahjahan History
शाहजहाँ का नाम एक ऐसे आशिक के रूप पर लिया जाता है जिसने अपने प्यार की खातिर विश्व की सबसे ख़ूबसूरत इमारत बनाई जिसका नाम है “ताज महल” । उन्होंने अपनी बेग़म मुमताज़ महल की याद मे ताज महल का निर्माण करवाया था । उस जमाने मे ताज महाल बनाने मे 6 करोड़ की लागत आई थी। शाह जहाँ अपनी न्यायप्रियता और वैभवविलास के कारण अपने काल में बड़े प्रसिद्ध रहे। अपने पराक्रमो से आदिलशाह और निजामशाह के प्रस्थापित वर्चस्वो को मूह तोड़ जवाब देकर सफलता मिलाने वाला राजा के रूप में शाहजहाँ की पहचान होती है।
शाहजहॉ को निर्माताओं का राजकुमार कहा जाता है शाहजहॉ द्वारा बनाई गई इमारतें – दिल्‍ली का लाल किला, दीवाने आम, दीवाने खास, दिल्‍ली की जामा मस्जिद, आगरा मोती मस्जिद, ताजमहल आदि हैं। सम्राट जहाँगीर के मौत के बाद, छोटी उम्र में ही उन्हें मुगल सिंहासन का उत्तराधिकारी बना लिया था। 4 फरवरी 1627 में अपने पिता की मौत होने के बाद वह सिंघासन पर बैठे। वह मुगल साम्राज्य के 5बवे सम्राट बने थे। उनके शासनकाल को मुग़ल शासन का स्वर्ण युग और भारतीय सभ्यता का सबसे समृद्ध काल बुलाया गया है।
शाहजहाँ का जन्म जोधपुर के शासक राजा उदयसिंह की पुत्री ‘जगत गोसाई’ (जोधाबाई) (जो की बाद में ताज बीबी बिलक़िस मकानी के नाम से जानी गयी।) के गर्भ से 5 जनवरी, 1592 ई. को लाहौर में हुआ था। उनका बचपन का नाम ख़ुर्रम था। ख़ुर्रम जहाँगीर का छोटा पुत्र था, जो छल−बल से अपने पिता का उत्तराधिकारी हुआ था। वह बड़ा तेज़ बुद्धि, साहसी और शौक़ीन बादशाह थे। शाहजहाँ का विवाह 20 वर्ष की आयु में नूरजहाँ के भाई आसफ़ ख़ाँ की पुत्री ‘आरज़ुमन्द बानो’ से सन् 1611 में हुआ था। वही बाद में ‘मुमताज़ महल’ के नाम से उसकी प्रियतमा बेगम हुई।
शाहजहाँ ने सन् 1648 में आगरा की बजाय दिल्ली को राजधानी बनाया, लेकिन उसने आगरा की कभी उपेक्षा नहीं की। उसके प्रसिद्ध निर्माण कार्य आगरा में भी थे। शाहजहाँ का दरबार सरदार सामंतों, प्रतिष्ठित व्यक्तियों तथा देश−विदेश के राजदूतों से भरा रहता था। उसमें सबके बैठने के स्थान पहले से तय थे। जिन व्यक्तियों को दरबार में बैठने का सौभाग्य प्राप्त था, वे अपने को धन्य मानते थे और लोगों की नजरो में उन्हें गौरवान्वित समझा जाता था। जिन विदेशी सज्ज्नों को दरबार में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था, वे वहाँ के रंग−ढंग, शान−शौक़त और ठाट−बाट को देख कर आश्चर्य चकित हो जाते थे । तख्त-ए-ताऊस शाहजहाँ के बैठने का राजसिंहासन था।
सम्राट अकबर ने जिस उदार धार्मिक नीति के कारण अपने शासन काल में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की थी, वह शाहजहाँ के काल में नहीं थी। उसमें इस्लाम धर्म के प्रति कट्टरता और कुछ हद तक धर्मान्धता थी। वह मुसलमानों में सुन्नियों के प्रति पक्षपाती और शियाओं के लिए अनुदार था। हिन्दू जनता के प्रति सहिष्णुता एवं उदारता नहीं थी।
शाहजहाँ ने खुले आम हिन्दू धर्म के प्रति विरोध भाव प्रकट नहीं किया, तथापि वह अपने अंत:करण में हिन्दुओं के प्रति असहिष्णु एवं अनुदार था। शाहजहाँ बहुत निडर थे। आदिलशहा, कुतुबशहा ये दोनों भी उनके शरण आये. निजामशाह की तरफ से अकेले शहाजी भोसले ने शाहजहाँ से युद्ध किया।
शाहजहाँ ने उसके ऊपर तीनो तरफ से आक्रमण किया। बचाव का कोई भी मार्ग न पाकर आदिलशाह ने 1636 ई. में शाहजहाँ की शर्तों को मान लिया और संधि कर ली। भारत के दुश्मन कम हो जाने के बाद शहाजहान की नजर मध्य एशिया के समरकंद के तरफ गयी।लेकिन 1639-48 इस समय में बहुत खर्चा करके भी वो समरकंद पर जीत हासिल कर नहीं सके। विजापुर और गोवळ कोंडा इन दो राज्यों को काबू में लेकर उसमे सुन्नी पथो का प्रसार करने के लिये औरंगजेब को चुना गया।
पर औरंगजेब ने खुद के भाई की हत्या कर के बिमार हुये शाहजहाँ को कैद खाने में डाल दिया और ख़ुद सन् 1658 में मुग़ल सम्राट बन गया। शाहजहाँ 8 वर्ष तक आगरा के क़िले के शाहबुर्ज में क़ैद रहे।वहां उनका अंतिम समय बड़े दु:ख और मानसिक क्लेश में बीता । अंत में जनवरी, सन् 1666 में उनकी मृतु हो गई। उस समय उनकी आयु 74 साल की थी। उसे उनकी प्रिय बेगम के पार्श्व में ताजमहल में ही दफ़नाया गया था।

 

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