झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरता का इतिहास

0
134

महारानी लक्ष्मीबाई का इतिहास

झाँसी की रानी (लक्ष्मीबाई) मराठा द्वारा शासन राज्य झाँसी की रानी थी। जो उत्तर-मध्य भारत में स्थित है। रानी लक्ष्मीबाई 1857 की सबसे पहली भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वीर नारी थी जिन्होंने अल्पायु में ही ब्रिटिश साम्राज्य से आंदोलन किया था।
हमारे देश की स्वतंत्रता के लिए अनेक राजाओं ने लड़ाइयाँ लड़ी और इस कोशिश में हमारे देश की वीर तथा साहसी स्त्रियों ने भी उनका साथ दिया. इन वीरांगनाओं में रानी दुर्गावती, रानी लक्ष्मीबाई, आदि का नाम शामिल हैं. रानी लक्ष्मीबाई ने हमारे देश और अपने राज्य झाँसी की स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश राज्य के खिलाफ लड़ने का साहस किया और अंत में वीरगति को प्राप्त हुई।
रानी लक्ष्मीबाई जीवन परिचय

नाम – मणिकर्णिका ताम्बे [ विवाह के पश्चात् लक्ष्मीबाई नेवलेकर ]

जन्म सन 1828

मृत्यु सन 1858 [ 29 वर्ष ]

पिता मोरोपंत ताम्बे

माता भागीरथी बाई

पति – झाँसी नरेश महाराज गंगाधर रावनेवलेकर

संतान – दामोदर राव, आनंद राव [ दत्तक पुत्र ]

घराना मराठा साम्राज्य

उल्लेखनीय कार्य सन 1857 का स्वतंत्रता संग्राम

रानी लक्ष्मीबाई में अनेक विशेषताएँ थी, जैसे :

1. नियमानुकूल योगाभ्यास करना,
2. धार्मिक कार्यों में दिलचस्पी,
3. सैन्य कार्यों में दिलचस्पी एवं योग्यता,
4. उन्हें घोड़ो की अच्छी परख थी,
5. रानी अपनी का प्रजा का सभी प्रकार से ध्यान रखती थी,
6. गुनाह करने वालों को उचित सजा देने का भी साहस रखती थी।
लक्ष्मी बाई की शादी –

सन 1842 में उनकी शादी उत्तर भारत में स्थित झाँसी राज्य के महाराज गंगाधर राव नेवलेकर के साथ हो गया, तब वे झाँसी की रानी बनी। उस समय वे मात्र 14 साल की थी। विवाह के तुरंत बाद ही उन्हें ‘लक्ष्मीबाई’ नाम मिला। उनकी शादी पुराने झाँसी में स्थित गणेश मंदिर में हुआ था। सन 1851 में उन्होंने एक बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम दामोदर राव रखा गया, परन्तु दुर्भाग्यवश वह सिर्फ 4 महीने ही जीवित रह सका।

ऐसा कहा जाता हैं कि महाराज गंगाधर राव नेवलेकर अपने बेटे की मौत से कभी बाहर ही नही निकल पाए और सन 1853 में महाराज बहुत बीमार पड़ गये, तब उन दोनों ने मिलकर अपने रिश्तेदार (महाराज गंगाधर राव के भाई ) के बेटे को गोद लेना निश्चित किया। इस प्रकार गोद लिए गये बेटे के उत्तराधिकार पर ब्रिटिश सरकार कोई मुसीबत न ले, इसलिए यह कार्य ब्रिटिश अफसरों की उपस्थिति में पूरा किया गया। इस बालक का नाम आनंद राव था, जिसे बाद में बदलकर दामोदर राव रखा गया।
रानी लक्ष्मी का उत्तराधिकारी बनना –

21 नवम्बर, सन 1853 में महाराज गंगाधर राव नेवलेकर की मौत हो गयी, उस समय रानी की आयु मात्र 18 वर्ष थी। परन्तु रानी ने अपनी स्थिरता और हिम्मत नहीं खोया और बालक दामोदर की आयु कम होने के कारण राज्य – काज का उत्तरदायित्व महारानी लक्ष्मीबाई ने खुद पर ले लिया। उस समय लार्ड डलहौजी गवर्नर था।

उस समय यह नियम था कि शासन पर उत्तराधिकार तभी होगा, जब राजा का खुद का पुत्र हो, यदि पुत्र न हो तो उसका राज्य ईस्ट इंडिया कंपनी में मिल जाएगा और राज्य परिवार को अपने खर्चों हेतु पेंशन दी जाएगी। उसने महाराज की मौत का फायदा उठाने का प्रयाश किया । वह झाँसी को ब्रिटिश राज्य में मिलाना चाहता था। उसका कहना था कि महाराज गंगाधर राव नेवलेकर और महारानी लक्ष्मीबाई की अपनी कोई संतान नहीं हैं और उसने इस प्रकार गोद लिए गये पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से मना कर दिया। तब महारानी लक्ष्मीबाई ने लन्दन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ मुक़दमा दायर किया। पर वहाँ उनका मुकदमा ख़ारिज कर दिया गया। साथ ही यह आदेश भी दिया गया की महारानी, झाँसी के किले को खाली कर दे और स्वयं रानी महल में जाकर रहें, इसके लिए उन्हें रूपये 60,000/- की पेंशन दी जाएगी। परन्तु रानी लक्ष्मीबाई अपनी झाँसी को न देने के फैसले पर थी। वे अपनी झाँसी को सुरक्षित करना चाहती थी, जिसके लिए उन्होंने सेना को एकजुट प्रारंभ किया।
संघर्ष की शुरुआत :

मेरी झाँसी नहीं दूंगी : 7 मार्च, 1854 को ब्रिटिश सरकार ने एक सरकारी गजट जारी किया, जिसके अनुसार झाँसी को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलने का आदेश दिया गया था। रानी लक्ष्मीबाई को ब्रिटिश अफसर एलिस द्वारा यह आदेश मिलने पर उन्होंने इसे मानने से इंकार कर दिया और कहा ‘ मेरी झाँसी मैं नहीं दूंगी’ और अब झाँसी विद्रोह का केन्द्रीय बिंदु बन गया। रानी लक्ष्मीबाई ने कुछ अन्य राज्यों की मदद से एक सेना तैयार की, जिसमे केवल मर्द ही नहीं, अपितु औरतें भी शामिल थी; जिन्हें युध्द में लड़ने के लिए प्रशिक्षण दिया गया था। उनकी सेना में अनेक महारथी भी थे, जैसे : गुलाम खान, दोस्त खान, खुदा बक्श, सुन्दर – मुन्दर, काशी बाई, लाला भाऊ बक्शी, मोतीबाई, दीवान रघुनाथ सिंह, दीवान जवाहर सिंह, आदि. उनकी सेना में लगभग 14,000 सैनिक थे.

10 मई, 1857 को मेरठ में भारतीय विद्रोह प्रारंभ हुआ, जिसका कारण था कि जो बंदूकों की नयी गोलियाँ थी, उस पर सूअर और गौमांस की परत चढ़ी थी। इससे हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं पर ठेस लगी थी और इस कारण यह विद्रोह देश भर में फ़ैल गया था । इस विद्रोह को दबाना ब्रिटिश सरकार के लिए ज्यादा जरुरी था,
फिर उन्होंने झाँसी को फ़िलहाल रानी लक्ष्मीबाई के पास छोड़ने का निर्णय तय किया
इस दौरान सितम्बर – अक्टूबर, 1857 में रानी लक्ष्मीबाई को अपने पड़ोसी देशो ओरछा और दतिया के राजाओ के साथ युध्द करना पड़ा क्योकिं उन्होंने झाँसी पर चढ़ाई कर दी थी।

इसके कुछ समय बाद मार्च, 1858 में अंग्रेजों ने सर ह्यू रोज के नेतृत्व में झाँसी पर हमला कर दिया और तब झाँसी की ओर से तात्या टोपे के नेतृत्व में 20,000 सैनिकों के साथ यह लड़ाई लड़ी गयी, जो पूरे 2 सप्ताह तक चली। अंग्रेजी सेना किले की दीवारों को गिराने में सफल रही और नगर पर कब्ज़ा कर लिया। इस समय अंग्रेज सरकार झाँसी को हथियाने में कामयाब रही और अंग्रेजी सैनिकों ने नगर में लूट – पाट भी शुरू कर दी। फिर भी रानी लक्ष्मीबाई किसी प्रकार अपने पुत्र दामोदर राव को बचाने में सफल रही।

काल्पी की लड़ाई :

इस युध्द में हार जाने के कारण उन्होंने 24 घंटों में 102 किलो मीटर का सफ़र तय किया और अपने दल के साथ काल्पी पहुंची और कुछ समय कालपी में सरण ली, जहाँ वे ‘तात्या टोपे’ के साथ थी। तब वहाँ के पेशवा ने परिस्थिति को समझ कर उन्हें शरण दी और अपना सैन्य शक्ति भी प्रदान किया।

22 मई, 1858 को सर ह्यू रोज ने काल्पी पर आक्रमण कर दिया, तब रानी लक्ष्मीबाई ने वीरता और रणनीति से उन्हें परास्त किया और अंग्रेजो को पीछे हटना पड़ा। कुछ समय पश्चात् सर ह्यू रोज ने काल्पी पर फिर से हमला किया और इस बार रानी को हार का मुह देखना पड़ा।

युद्ध में हारने के पश्चात् राव साहेब पेशवा, बन्दा के नवाब, तात्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई और अन्य मुख्य योध्दा गोपालपुर में एकजुट हुए। रानी ने ग्वालियर पर अधिकार प्राप्त करने का सुझाव दिया ताकि वे अपने लक्ष्य में सफल हो सके और वही रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने इस प्रकार गठित एक विद्रोही सेना के साथ मिलकर ग्वालियर पर आक्रमण कर दिया। वहाँ इन्होने ग्वालियर के महाराजा को हरा दिया और रणनीतिक तरीके से ग्वालियर के किले पर जीत हासिल की और ग्वालियर का राज्य पेशवा को सौप दिया।

रानी लक्ष्मी बाई मृत्यु :
17 जून, 1858 में किंग्स रॉयल आयरिश के खिलाफ जंग लड़ते समय उन्होंने ग्वालियर के पूर्व क्षेत्र का मोर्चा संभाला। इस युध्द में उनकी सेविकाए तक शामिल थी और पुरुषो की पोषक धारण करने के साथ ही उतनी ही वीरता से युध्द भी कर रही थी। इस युध्द के दौरान वे अपने ‘राजरतन’ नामक घोड़े पर सवार नहीं थी और यह घोड़ा नया था, जो नहर के उस पार नही कूद पा रहा था, रानी इस स्थिति को समझ गयी और वीरता के साथ वही युध्द करती रही। इस समय वे बुरी तरह से घायल हो चुकी थी और वे घोड़े पर से गिर पड़ी। परंतु वे पुरुष पोषक में थी, अतः उन्हें अंग्रेजी सैनिक पहचान नही पाए और उन्हें छोड़ दिया। तब रानी के विश्वास पात्र सैनिक उन्हें पास के गंगादास मठ में ले गये और उन्हें गंगाजल दिया। तब उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा बताई की “ कोई भी अंग्रेज अफसर उनकी मृत देह को हाथ न लगाए। ” इस प्रकार कोटा की सराई के पास ग्वालियर के फूलबाग क्षेत्र में उन्हें वीरगति प्राप्त हुई अर्थात् वे मृत्यु को प्राप्त हुई.

ब्रिटिश सरकार ने 3 दिन बाद ग्वालियर को हथिया लिया. उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके पिता मोरोपंत ताम्बे को गिरफ्तार कर लिया गया और फांसी की सजा दी गयी.

रानी लक्ष्मीबाई के गोद लिए पुत्र दामोदर राव को ब्रिटिश राज्य द्वारा पेंशन दी गयी और उन्हें उनका उत्तराधिकार कभी नहीं मिला
बाद में राव इंदौर शहर में रहने लगे गये और उन्होंने अपने जीवन का काफी समय अंग्रेज सरकार को मनाने एवं अपने अधिकारों को पुनः प्राप्त करने के प्रयासों में व्यतीत किया. उनकी मौत 28 मई, 1906 को 58 वर्ष में हो गयी.

इस प्रकार देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए उन्होंने अपनी जान तक समर्पित कर दी।

Leave your vote

0 points
Upvote Downvote

Total votes: 0

Upvotes: 0

Upvotes percentage: 0.000000%

Downvotes: 0

Downvotes percentage: 0.000000%

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here